
नरवाई न जलाएं: जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाकर बढ़ाएं मिट्टी की उर्वरता
नरवाई जलाने के बजाय किसान जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ा सकते हैं और बेहतर उत्पादन प्राप्त कर सकते हैं।
फसल कटाई के बाद खेत में बची हुई नरवाई को जलाना कई किसानों के लिए एक आसान तरीका माना जाता है, लेकिन यह तरीका खेती, मिट्टी और पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक है। कई किसान जल्दी खेत खाली करने के लिए नरवाई को आग लगा देते हैं, जिससे तुरंत तो खेत साफ हो जाता है, लेकिन इसके गंभीर दुष्प्रभाव लंबे समय तक दिखाई देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसान नरवाई को जलाने के बजाय उसे खेत में ही उपयोग करें और जैविक एवं प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाएं, तो इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है और उत्पादन भी बेहतर होता है।
नरवाई क्या होती है?
जब किसान गेहूं, धान या अन्य फसलों की कटाई करते हैं तो खेत में फसल के अवशेष बच जाते हैं जिन्हें नरवाई कहा जाता है।
नरवाई जलाने के नुकसान
- मिट्टी की उर्वरता कम हो जाती है
- मिट्टी के सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं
- वायु प्रदूषण बढ़ता है
- आने वाली फसल का उत्पादन कम हो सकता है
मिट्टी पर प्रभाव
नरवाई जलाने से मिट्टी में मौजूद कार्बनिक पदार्थ और पोषक तत्व कम हो जाते हैं जिससे मिट्टी की गुणवत्ता घटती है।
नरवाई का सही प्रबंधन
किसान नरवाई को खेत में मिलाकर जैविक खाद के रूप में उपयोग कर सकते हैं। इससे मिट्टी की संरचना मजबूत होती है।
जैविक खेती के फायदे
- मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है
- रासायनिक लागत कम होती है
- फसल की गुणवत्ता बेहतर होती है
प्राकृतिक खेती क्यों जरूरी है
प्राकृतिक खेती में गोबर, गोमूत्र और अन्य प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग किया जाता है जिससे खेती टिकाऊ बनती है।
सरकारी प्रयास
सरकार भी किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन और प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रही है।
निष्कर्ष
नरवाई जलाना खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक है। किसान यदि जैविक और प्राकृतिक खेती अपनाएं तो इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ेगी और उत्पादन भी बेहतर होगा।
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